Decision for the success of homosexuality from 1860 to 2018

समलैंगिकता की सफलता का फैसला 1860 से 2018 तक

समलैंगिकता की सफलता का फैसला 1860 से 2018 तक
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आईपीसी में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है आईपीसी की धारा 377 के अनुसार जो कोई भी पुरुष महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए 10 वर्ष की सजा या पूरा जीवन कारावास में काटना और साथ ही साथ जमाने का भुगतान भी करना पड़ेगा|

एलजीबीटी के अंदर लैसबियन बाय सेक्सुअल ट्रांसजेंडर गे आते है एलजीबीटी की मांग है कि उन्हें यह हक दिया जाए की धारा 377 को अवैध माना जाए निजता का अधिकार के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की के बाद इस समुदाय ने अपनी मांगों को फिर से तेज करा|

कोर्ट ने यह फैसला लेते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया 150 सालों से यह लागू कानून अब बर्खास्त हो चुका है यह एलजीबीटी की एक बड़ी जीत साबित हुई
10 से 17 जुलाई के बीच 4 दिन चली है सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला लेते हुए समलैंगिक सेक्स को अपराध नहीं बताया|

लगभग 26 देशों में समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणियों से हटा दिया गया है ऑस्ट्रेलिया माल्टा जर्मनी फिनलैंड कनाडा स्पेन पुर्तगाल ऐसी कुछ देश और भी हैं इसलिए कानून हटा दिया गया है
आईपीसी की धारा 377 की बात काफी सालों से चली आ रही थी लगभग अलग-अलग लोगों के इस पर अलग-अलग मत थे काफी सालों से इस पर अलग-अलग विचार विमर्श होती थी आखिर में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया|

एक शादीशुदा जोड़ा परंतु उसमें से पति का पत्नी के कई बार अवैध संबंध थे वह और वह संबंध आगे बढ़ाना चाहते हैं परंतु समाज ऐसे रिश्तो को कभी अपना आता नहीं नजर में बहुत ही बड़ा अपराध है मजबूरी में उन्हें शादी करनी पड़ती है अभी शादी करके अपने जीवनसाथी को धोखा देते हैं पर अपने अवैध संबंध कायम रखते हैं यह बहुत ही बड़ा अपराध है|

इस पर काफी विचार रखे गए

समलैंगिकता पर काफी सालों से काफी विचार-विमर्श किए जा रहे थे जो कि इस प्रकार हैं
1860 ब्रिटिश सरकार ने धारा 377 को भारत में लागू किया था|

जुलाई 2009 दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार आईपीसी की धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और गैरकानूनी साबित किया|

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को गलत करार करते हुए समलैंगिकता को वापस अपराध बताया|

2014 में नाज फाउंडेशन ने फैसले का अनुरोध कर दोबारा याचिका दायर की लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने से खारिज का करा|

2016 एलजीबीटी के खिलाफ 5 लोगों ने डालमिया अमरनाथ जैसे लोगों ने दोबारा याचिका दायर की उनका कहना था कि दो बालिकाओं के बीच बनाए गए सेक्स संबंध के लिए उन्हें जेल में डालना सही नहीं है|

9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा थी 377 पर विचार करने वाली चुनौतियां देने वाली याचिकाओं पर 10 जुलाई से सुनवाई करी जाएगी|

सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों ने 10 से 17 जुलाई के अंदर 4 दिन में अपनी फैसले को सुरक्षित रखा
6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया|

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